तेरी गलियों से मेरा गुजरना क्या कम हुआ
तेरी गलियों से मेरा गुजरना क्या कम हुआ , सीड़ियों पर बैठे तेरे आशिक का इंतजार मुकम्मल सा हो गया , कुछ सवाल है तुझसे क्या तेरी परेशानियों के बजह को मेरी तरह उसकी हँसी वैसे ही सहलादिया करती है जैसे मुझे देखकर तेरी सारी परेशानिया गायब सी हो जाती थी कहती थी तू सामने जब तू आता है मेरे दिल की धड़कनें मेरे काबू में नहीं रहती क्या उसको पास देखकर भी वैसा ही होता है जैसा मुझे देखकर तेरा खुशी का ठिकाना न रहता था क्या सबाब के नशे में गुम होके तू उसे सारे राज बता देती है जो मेरे सामने बोलती थी बोलना ,,,, क्या तू अपनी जुल्फों को अपने गालों से फिसलने देती है ताकि वो अपनी उंगुलियों से उन्हें पीछे कर सके वैसे ही जैसे मैं किया करता था क्या वो भी तेरी आँखों में आँखें डालके शामों को रातें कर देता है जैसे मैं किया करता था क्या उसे भी दिखादी तेरी वो सारी तस्वीरें , जिसमें तू आज भी अपना बचपन खोजती है क्या उसे भी बतादी वो सारी बातें जो तूने मुझे यह कहकर बताई थीं कि आजतक किसी को नहीं बताया बोलना ,,, चल इन सब सवालों का जबाब मत दे बस तू इस एक सबाल का जबाव दे। सुमित श्रोत्रिय की कलम से ✍️